भूख, कुपोषण न बने महामारी

भूख कुपोषण न बने महामारी

भरपूर हो । भारत में महिलाओं की पचास फीसदी से अधिक आबादी एनीमिया यानी खून की कमी से पीड़ित है । इसलिए ऐसे हालात में जन्म लेने वाले बच्चों का कम वजन होना लाजिमी है । राइट टु फूड कैंपेन नामक संस्था का विश्लेषण है कि पोषण गुणवत्ता में काफी कमी आई है और लॉकडाउन से पहले की तुलना में भोजन की मात्रा भी घट गई है । ऊंचे पैमाने में पारिवारिक आय में भी काफी कमी आई है । महामारी के बाद पैदा हुई भुखमरी . बेरोजगारी और कुपोषण को विस्थापन ने और भयानक

के असर से पैदा हो रहे आर्थिक एवं सामाजिक तनावों पर विस्तृत जानकारी हासिल की है । भारत को लेकर M प्रकाशित आंकड़े चिंताजनक हैं । वैश्विकं महामारी से उत्पन्न भुखमरी पर 107 देशों की जो सूची उपलब्ध है , उसके मुताबिक भारत 94 वें पायदान पर है । एक तरफ हम खाद्यान्न के मामले में न केवल आत्मनिर्भर हैं , बल्कि अनाज का एक बड़ा हिस्सा निर्यात करते हैं । वहीं दूसरी ओर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में है । विश्व के 4.95 करोड़ बच्चों के मुकाबले भारत लंबाई के हिसाब से कम वजन के 2.55 करोड़ बच्चों का घर है । बच्चे के जन्म से लेकर तीन साल तक 1,000 दिन को ' सुनहरे दिन ' कहा जाता है । शुरुआती छह महीने निरंतर मां का दूध मिलना अनिवार्य है और शेष समय में ऐसा भोजन जो पोषक तत्वों से

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